Ranchi:  प्रदेश कांग्रेस महासचिव आलोक कुमार दूबे ने भाजपा के के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की एकता और अधिकारों के लिए आयोजित कार्यक्रम को धर्म के चश्मे से देखना भाजपा की संकीर्ण और विभाजनकारी राजनीति का परिचायक है। उन्होंने कहा कि रांची में आयोजित महाजुटान में आदिवासी समाज के विभिन्न वर्गों और समुदायों की भागीदारी को भाजपा द्वारा “ईसाई रैली” बताना झारखंड के आदिवासी समाज का अपमान है। आदिवासी समाज एक है और उसकी एकता को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश झारखंड की सामाजिक संरचना को कमजोर करने की साजिश है।

आलोक कुमार दूबे ने कहा कि पहले यह बताना चाहिए कि भाजपा को आदिवासी अधिकारों और आदिवासी अस्मिता की चिंता क्यों नहीं होती है? जब आदिवासियों की जमीन, जंगल और अधिकारों से जुड़े सवाल सामने आते हैं, तब भाजपा की प्राथमिकता क्या होती है, यह झारखंड की जनता अच्छी तरह जानती है।वर्तमान में खनिज अधिनियम कानून प्रत्यक्ष प्रमाण है। उन्होंने कहा कि विधानसभा की अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर कौन निर्वाचित होगा, इसका फैसला संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया करती है, भाजपा का कोई नेता नहीं। किसी निर्वाचित विधायक को उसके धर्म के आधार पर आदिवासी प्रतिनिधित्व से कमतर बताना लोकतंत्र और संविधान दोनों का अपमान है।

आलोक कुमार दूबे ने कहा कि भाजपा पहले यह समझ लें कि आदिवासी होना किसी एक धर्म की बपौती नहीं है। आदिवासी समाज में अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं को मानने वाले लोग हैं, लेकिन उनकी सामाजिक और संवैधानिक पहचान आदिवासी है। भाजपा का काम उन्हें आपस में लड़ाना नहीं, उनके अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के विचार को धर्म के साथ जोड़कर पेश करना भी भाजपा की राजनीतिक चाल है। प्रतिनिधित्व का सवाल संविधान, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा है, किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान से नहीं।

मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में नहीं आने को लेकर भाजपा के बयान पर आलोक कुमार दूबे ने कहा कि किसी मुख्यमंत्री का किसी कार्यक्रम में उपस्थित होना या नहीं होना राजनीतिक गठबंधन की मजबूती का प्रमाण नहीं होता। यदि मुख्यमंत्री स्वयं उपस्थित नहीं हो सके और उनकी ओर से जनप्रतिनिधि कार्यक्रम में पहुंचे, तो भाजपा को इसमें राजनीतिक दरार खोजने के बजाय वास्तविक मुद्दों पर बात करनी चाहिए।

फतवा शब्द का इस्तेमाल कर धर्मगुरुओं को बदनाम करना बंद करे भाजपा.

आर्चबिशप के पत्र को “फतवा” बताए जाने पर आलोक कुमार दूबे ने कहा कि किसी धार्मिक समुदाय के लोगों से किसी सामाजिक कार्यक्रम में शामिल होने की अपील या निर्देश को सांप्रदायिक रंग देना भाजपा की आदत बन चुकी है। यदि किसी धार्मिक संस्था ने अपने समुदाय के लोगों से कार्यक्रम में भाग लेने का आह्वान किया, तो इसमें भाजपा को इतनी बेचैनी क्यों हो रही है? उन्होंने कहा कि भाजपा को यदि वास्तव में धार्मिक संस्थाओं के राजनीतिक इस्तेमाल की चिंता है तो वह हर धर्म और हर संगठन के मामले में समान मापदंड अपनाए।

आलोक कुमार दूबे ने कहा कि झारखंड की राजनीति मंदिर-मस्जिद, हिंदू-ईसाई और आदिवासी-गैरआदिवासी के नाम पर बांटने से नहीं चलेगी। अब जनता विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों पर जवाब मांगेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और झामुमो का राजनीतिक संबंध किसी धार्मिक कार्यक्रम की उपस्थिति से तय नहीं होता। भाजपा यदि गठबंधन की चिंता छोड़कर जनता के सवालों का जवाब दे तो बेहतर होगा।

आलोक कुमार दूबे ने कहा,झारखंड की जनता को धर्म के नाम पर बांटने की राजनीति बहुत देख ली है। आदिवासी समाज को वोट बैंक समझने वाली राजनीति भाजपा करती होगी, कांग्रेस आदिवासी समाज को संविधान प्रदत्त अधिकारों, सम्मान और बराबरी का अधिकार देने में विश्वास रखती है। भाजपा जितना समाज को बांटने की कोशिश करेगी, उतना ही झारखंड का आदिवासी समाज संविधान और सामाजिक एकता के साथ मजबूती से खड़ा होगा।

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