Ranchi: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के जनसंख्या और आदिवासी अस्मिता को लेकर दिए गए बयान पर झारखंड प्रदेश कांग्रेस ने कड़ा पलटवार किया है। कांग्रेस के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने कहा कि झारखंड में हिंदू-मुस्लिम, बाहरी-भीतरी, आदिवासी-ईसाई, गोरा-काला का पुराना फॉर्मूला अब फेल हो चुका है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज जाग चुका है और अब भाजपा की बांटने वाली राजनीति को पूरी तरह नकार चुका है।

बाबूलाल जी बताएं – आदिवासियों की सीटें घटनी चाहिए या बढ़नी चाहिए ?

आलोक दूबे ने बाबूलाल मरांडी से सीधा सवाल पूछा। उन्होंने कहा कि मरांडी बार-बार आदिवासी समाज के भविष्य और जनसंख्या को लेकर भय का वातावरण पैदा कर रहे हैं, लेकिन असली मुद्दे पर चुप हैं। बाबूलाल जी को अपने तमाम हाइपोथेटिकल विचार रखने का अधिकार है, लेकिन वे यह स्पष्ट क्यों नहीं करते कि क्या वे झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या घटाने के पक्ष में हैं या बढ़ाने के? यही असली सवाल है और बाबूलाल मरांडी इसका सीधा जवाब देने से बच रहे हैं। उन्होंने बताया कि झारखंड विधानसभा में वर्तमान में अनुसूचित जनजाति के लिए 28 सीटें और लोकसभा में 5 सीटें आरक्षित* हैं। प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों में चिंता है कि प्रतिनिधित्व कम नहीं होना चाहिए।

जनगणना के आंकड़ों को भय का हथियार न बनाएं

बाबूलाल मरांडी द्वारा पाकुड़ जैसे जिलों के जनसंख्या आंकड़ों पर दिए बयान पर आलोक दूबे ने कहा कि जनगणना के आंकड़ों को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए।भारत की आखिरी पूर्ण जनगणना 2011 में हुई थी। बिना नई जनगणना के निश्चित निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। आबादी के प्रतिशत में बदलाव को सीधे घुसपैठ या किसी एक समुदाय की साजिश बता देना गंभीर सांख्यिकीय सरलीकरण है। उन्होंने कहा,जनगणना के पुराने आंकड़ों को भय और धार्मिक ध्रुवीकरण का हथियार बनाकर आदिवासी समाज को डराने की राजनीति अब नहीं चलेगी।

*अलग राज्य की लड़ाई पर भाजपा को घेरा*
आलोक दूबे ने झारखंड आंदोलन में भाजपा के योगदान पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा, _”बाबूलाल मरांडी बताएं भाजपा ने आंदोलन के किस दौर में क्या निर्णायक भूमिका निभाई और उनके कौन से नेता जेल गए? झारखंड के कांग्रेस विधायक तो एकीकृत बिहार में मंत्री पद त्याग कर अलग राज्य के निर्माण में सार्थक भूमिका निभा चुके हैं।”_

उन्होंने याद दिलाया कि झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद के गठन ने अलग राज्य की मांग को संस्थागत आधार दिया और कांग्रेस नेता स्व. ज्ञान रंजन और टी. मुचिराय मुंडा समेत कई नेताओं ने आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

आदिवासी समाज के जागने से भाजपा में बेचैनी

आलोक दूबे ने आरोप लगाया कि विधानसभा हो या लोकसभा, आदिवासी समाज ने भाजपा को पूरी तरह नकार दिया है।आदिवासी समाज की वर्तमान एकजुटता ने भाजपा के भीतर बेचैनी और बौखलाहट पैदा कर दी है। यही कारण है कि कभी बाहरी-भीतरी, कभी हिंदू-मुस्लिम और अब आदिवासी-ईसाई के नाम पर समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा,आदिवासी, क्रिश्चियन और मुस्लिम का गीत गाने से राजनीति नहीं चलेगी। झारखंड की जनता अब भाषण नहीं, नीयत और काम देखती है।

अंत में उन्होंने कहा कि झारखंड की जनता ने बहुत संघर्ष के बाद यह राज्य हासिल किया है और अब वह अपने अधिकारों, विकास और सामाजिक सौहार्द के साथ समझौता नहीं करेगी। भाजपा को समझ लेना चाहिए कि झारखंड में नफरत और विभाजन की राजनीति की उम्र पूरी हो चुकी है।

 

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