Ranchi: झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव सह मीडिया विभाग के संयोजक लाल किशोर नाथ शाहदेव ने भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश प्रभारी और सह-प्रभारियों की नियुक्ति पर बड़ा तंज कसा है। उन्होंने कहा कि भाजपा को अब झारखंड में अपना कोई कद्दावर आदिवासी चेहरा नजर नहीं आ रहा है, इसलिए छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के आदिवासी नेताओं को झारखंड की जिम्मेदारी देकर मीडिया मैनेजमेंट से हवा बनाने की कोशिश की जा रही है।
लाल किशोर नाथ शाहदेव ने सोमवार को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी अब यह बात समझ आ गई है कि झारखंड में उनके सभी बड़े आदिवासी नेताओं को जनता ने पूरी तरह से रिजेक्ट कर दिया है।
बाबूलाल, अर्जुन मुंडा, चंपई सबको जनता ने नकारा – शाहदेव
शाहदेव ने नाम गिनाते हुए कहा, “बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, चंपई सोरेन, मधु कोड़ा और गीता कोड़ा जैसे बड़े आदिवासी नेताओं को झारखंड की जनता ने लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में खारिज कर दिया है। इन नेताओं पर जनता का भरोसा खत्म हो चुका है।” उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि झारखंड की जनता ने भाजपा के आदिवासी नेतृत्व को सिरे से नकार दिया है। इसी हताशा में भाजपा अब बाहर के नेताओं को लाकर चेहरा बदलने की राजनीति कर रही है।
शाहदेव ने कहा “नेता बदलने से भारतीय जनता पार्टी को कोई सफलता मिलने वाली नहीं है। क्योंकि आप चेहरा बदल रहे हैं, लेकिन चरित्र और सोच वही पुरानी है। भाजपा आदिवासियों के ज्वलंत मुद्दों पर बात ही नहीं करती है।”
सरना धर्म कोड पर भाजपा चुप क्यों? – कांग्रेस का सवाल
कांग्रेस महासचिव ने भाजपा को आदिवासी हितों के मुद्दे पर घेरते हुए कहा कि झारखंड के आदिवासी समाज की सबसे बड़ी और लंबे समय से लंबित मांग सरना धर्म कोड की है। उन्होंने कहा, “सरना धर्म कोड का प्रस्ताव झारखंड विधानसभा से सर्वसम्मति से पारित होकर केंद्र सरकार के पास भेजा गया है। यह सिर्फ एक धर्म कोड नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, पहचान और सम्मान का सवाल है। लेकिन दुख की बात है कि भाजपा के एक भी सांसद, एक भी विधायक, एक भी नेता इस मुद्दे पर केंद्र सरकार पर दबाव नहीं बनाते हैं।”
शाहदेव ने सवाल उठाया कि झारखंड से भाजपा के जो सांसद चुनकर गए हैं, उन्होंने संसद में कितनी बार सरना धर्म कोड का मुद्दा उठाया? उन्होंने कहा कि भाजपा के नेता दिल्ली में जाकर आदिवासी हितों की बात करने से कतराते हैं।
जल, जंगल, जमीन पर हमला और मंईयां सम्मान योजना बंद करने की साजिश
लाल किशोर नाथ शाहदेव ने भाजपा पर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “भाजपा एमएमडीआर कानून लागू कर झारखंड की मंईयां सम्मान जैसी कल्याणकारी योजना को बंद करना चाहती है। यह योजना झारखंड की महिलाओं, खासकर आदिवासी और दलित महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की सबसे बड़ी योजना है, जिसे इंडिया गठबंधन की सरकार ने सफलतापूर्वक लागू किया है। भाजपा इस योजना से बौखलाई हुई है।”
शाहदेव ने आगे कहा, “आदिवासियों का हक जल, जंगल और जमीन पर है। लेकिन आज भाजपा उन्हीं अधिकारों पर हमला करना चाहती है। वन अधिकार कानून, पेसा कानून और सीएनटी-एसपीटी एक्ट जैसे सुरक्षात्मक कानूनों को कमजोर करने की साजिश हो रही है। कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है।”
उन्होंने कहा कि जब तक भाजपा आदिवासियों के इन ज्वलंत सवालों – सरना कोड, जल-जंगल-जमीन, आरक्षण, और स्थानीय नियोजन नीति पर अपना रुख स्पष्ट नहीं करती, तब तक चाहे कितने भी प्रभारी बदल ले, जनता भाजपा पर भरोसा नहीं करने वाली।
मीडिया मैनेजमेंट से नहीं, जमीन पर काम से जीत मिलती है
कांग्रेस नेता ने कहा कि भाजपा अभी केवल मीडिया मैनेजमेंट के जरिए माहौल बनाने में लगी है। बाहर से प्रभारी लाकर फोटो सेशन और प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से संगठन मजबूत नहीं होता। “झारखंड की जनता काफी जागरूक और राजनीतिक रूप से समझदार है। वह देख रही है कि किस पार्टी ने उनके लिए काम किया है। हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने आदिवासियों के हित में जो काम किए हैं – चाहे वह अबुआ आवास योजना हो, सर्वजन पेंशन योजना हो, या फिर 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति की बात हो, जनता सब जानती है।”
शाहदेव ने अंत में कहा कि भाजपा को चाहिए कि वह पहले अपने केंद्र के नेताओं से झारखंड के आदिवासी हितों के मुद्दों पर जवाब लेकर आए, उसके बाद ही झारखंड फतह का सपना देखे। सिर्फ प्रभारी बदलने और नारे लगाने से 2029 तो दूर, 2029 तक झारखंड में भाजपा का संगठन बचना भी मुश्किल है।
