आपातकाल : आपातकाल की विभीषिका और भयावहता को याद करते हुए, झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा की ,अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र बना, किंतु स्वतंत्रता के ठीक 28 वर्ष बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा थोपा गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आघात सिद्ध हुआ। 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को लागू किया गया आपातकाल लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और संविधान की मूल भावना को कुचलने का प्रयास था। 26 जून 1975 की सुबह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, “राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की है। घबराने की कोई बात नहीं है।” किंतु यह घोषणा भारतीय लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर की शुरुआत थी। सत्ता बचाने की लालसा में इंदिरा गांधी ने तानाशाही का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी स्मृतियाँ आज भी उस पीढ़ी को विचलित कर देती हैं।
भारत इससे पूर्व अनुच्छेद-352 के अंतर्गत दो बार आपातकाल देख चुका था—1962 में चीन के आक्रमण तथा 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान। किंतु 1975 का आपातकाल पहली बार “आंतरिक अशांति” के आधार पर घोषित किया गया था। आपातकाल की घोषणा के साथ ही जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस सहित सैकड़ों विपक्षी नेताओं को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया गया। सत्ता पक्ष में होते हुए भी चंद्रशेखर को जेल भेज दिया गया क्योंकि वे इंदिरा गांधी की नीतियों के आलोचक बन चुके थे।
प्रेस पर कठोर सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार-पत्रों को प्रकाशन से पहले सरकारी स्वीकृति लेना अनिवार्य कर दिया गया। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया गया। परिणामस्वरूप कार्यपालिका निरंकुश हो गई तथा लोकतंत्र का स्वरूप लगभग समाप्त-सा हो गया।
इंदिरा गांधी केवल आपातकाल लागू कर संतुष्ट नहीं हुईं। उन्होंने इसी अवधि में 42वाँ संविधान संशोधन भी कराया, जिसे संविधान के इतिहास के सबसे व्यापक और विवादास्पद संशोधनों में गिना जाता है। आलोचकों ने इसे “मिनी संविधान” तक कहा।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में गठित शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 25 जून 1975 को राष्ट्रपति को आपातकाल की सलाह देने से पहले मंत्रिपरिषद से समुचित परामर्श नहीं किया गया था। आयोग ने यह भी माना कि आपातकाल किसी वास्तविक राष्ट्रीय संकट का परिणाम नहीं था, बल्कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित किए जाने के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट से उबरने का एक पूर्वनियोजित प्रयास था।
इमरजेंसी की पृष्ठभूमि
1971 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से जीत हासिल करने के बाद इंदिरा गांधी के प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने उनके निर्वाचन को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उन पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और चुनावी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। उधर देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार चरम पर थे। गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलनों ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर लिया था। 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई देशव्यापी रेल हड़ताल ने केंद्र सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी थीं। 12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करते हुए उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहरा दिया। इसके बाद उनकी राजनीतिक स्थिति संकट में आ गई। इसी पृष्ठभूमि में 25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मंजूरी से देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।
इस्तीफे के बजाय आपातकाल
संसदीय लोकतंत्र में ऐसी परिस्थिति आने पर नैतिक आधार पर त्यागपत्र देना एक स्वाभाविक विकल्प माना जाता है। इंदिरा गांधी चाहतीं तो किसी अन्य वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री पद सौंप सकती थीं, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके विपरीत उन्होंने आपातकाल का रास्ता चुना और सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली।
19 महीने का काला दौर
आपातकाल कुल 19 महीनों तक चला। इस दौरान संसद की अवधि बढ़ा दी गई और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ सीमित कर दी गईं। मार्च 1977 में जब आम चुनाव हुए तो जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं।
मीसा और डीआईआर का कहर
आपातकाल के दौरान मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) के तहत एक लाख से अधिक लोगों को जेलों में बंद किया गया। जयप्रकाश नारायण सहित अनेक नेताओं को लंबी अवधि तक कारावास झेलना पड़ा। इसी काल में संजय गांधी के प्रभाव में व्यापक स्तर पर नसबंदी अभियान चलाया गया। लाखों लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई। अनेक स्थानों पर प्रशासनिक दबाव और पुलिस कार्रवाई के माध्यम से लोगों को इस अभियान का शिकार बनाया गया।
नरेंद्र मोदी की दृष्टि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पुस्तक “The Emergency Diaries” में आपातकाल के दौरान के अनुभवों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि उस समय वे एक युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक थे और लोकतंत्र की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलन से जुड़े थे। उनके अनुसार, आपातकाल का दौर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के महत्व को समझने का एक बड़ा अनुभव था।
आज का भारत 1975 वाला भारत नहीं, लेकिन आपातकाल की टीस अमिट
आज का भारत 1975 वाला भारत नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ कहीं अधिक मजबूत हैं और नागरिक अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हैं। किंतु आपातकाल की स्मृति हमें यह चेतावनी देती है कि लोकतंत्र केवल संविधान की धाराओं से नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण से जीवित रहता है। 25 जून 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह सत्ता के केंद्रीकरण और संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग के खतरों का स्थायी स्मरण कराता है।
