Ranchi: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी द्वारा वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के पत्र के जवाब में राज्य के वित्तीय कुप्रबंधन को लेकर उठाए गए सवालों पर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि झारखंड के आर्थिक नुकसान का ठीकरा राज्य सरकार पर फोड़ने की कोशिश से भाजपा अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। असली सवाल यह है कि जिस राज्य की पहचान ही जल, जंगल और जमीन तथा खनिज संपदा से है, उसके संवैधानिक और आर्थिक अधिकारों पर केंद्र सरकार अंकुश क्यों लगाना चाहती है?
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि 2026 का एमएमडीआर संशोधन केवल खनन का कानून नहीं, बल्कि झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों के आर्थिक अधिकार और वित्तीय स्वायत्तता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। प्रस्तावित व्यवस्था में राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर नए कर लगाने की शक्ति को केंद्र द्वारा निर्धारित शर्तों से जोड़ दिया गया है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 25 जुलाई 2024 के ऐतिहासिक फैसले में राज्यों के खनिज अधिकारों और उनसे जुड़े कराधान के संवैधानिक पहलू को स्पष्ट किया था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब संविधान और सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों के अधिकारों की व्याख्या कर दी है, तो दिल्ली आखिर झारखंड के आर्थिक फैसले करने वाली कौन होती है?
आलोक दूबे ने कहा कि झारखंड देश के सबसे महत्वपूर्ण खनिज राज्यों में है। राज्य सरकार के खान एवं भूतत्व विभाग के अनुसार झारखंड के पास देश के लगभग 40 प्रतिशत खनिज संसाधन हैं। राज्य कोयला भंडार में पहले, लौह अयस्क में दूसरे और तांबा अयस्क भंडार में तीसरे स्थान पर है। यही खनिज संपदा झारखंड की औद्योगिक अर्थव्यवस्था, राजस्व, रोजगार और स्थानीय विकास की बड़ी आधारशिला है।
उन्होंने कहा कि खनिज क्षेत्र से मिलने वाला पैसा केवल सरकारी खजाने का आंकड़ा नहीं है। इसी राजस्व से सड़क, पुल, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण विकास, रोजगार और खनन प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास जैसी योजनाओं को गति मिलती है। खनन क्षेत्रों में जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) के माध्यम से प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यों के लिए भी राशि खर्च की जाती है। झारखंड में DMF के तहत देश में तीसरे सबसे अधिक संचय का उल्लेख राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण में किया गया है।
आलोक दूबे ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केंद्र को पत्र लिखकर खनिज-युक्त भूमि पर सेस से राज्य को होने वाले संभावित राजस्व नुकसान की गंभीरता बताई है। राज्य सरकार के अनुमान के अनुसार केवल Mineral Bearing Land Cess से लगभग ₹7,110 करोड़ सालाना राजस्व की संभावना थी। ऐसे में यदि राज्यों की इस तरह की वित्तीय शक्ति सीमित की जाती है तो उसका सीधा असर झारखंड की विकास योजनाओं और वित्तीय संसाधनों पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भले यह दावा करे कि खनिज क्षेत्र से मिलने वाले कुल वैधानिक राजस्व का लगभग 90 प्रतिशत राज्यों को मिलता है, लेकिन सवाल केवल रॉयल्टी और मौजूदा भुगतान का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी राज्य को अपनी खनिज संपदा से जुड़े अतिरिक्त वैधानिक राजस्व स्रोत तय करने का अधिकार रहेगा या नहीं? यही संघीय ढांचे और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता का मूल प्रश्न है। केंद्र सरकार स्वयं कह रही है कि संशोधन के बाद राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों एवं खनिज-युक्त भूमि पर नए कर लगाने की शक्ति केंद्र द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन होगी।
प्रदेश कांग्रेस महासचिव ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा का दोहन यहां की जनता की कीमत पर नहीं हो सकता। विस्थापन झारखंड का, प्रदूषण झारखंड का, जंगल और जमीन का नुकसान झारखंड का और रोजगार के संकट का सामना भी झारखंड के लोगों को करना पड़े—तो फिर खनिज से मिलने वाले आर्थिक अधिकारों का फैसला दिल्ली में बैठकर क्यों किया जाए?
उन्होंने बाबूलाल मरांडी से सवाल किया कि वे अंकगणित और आंकड़ों की राजनीति करने के बजाय यह बताएं कि झारखंड के खनिज अधिकारों को सीमित करने वाले केंद्रीय कानून का वे समर्थन क्यों कर रहे हैं? क्या भाजपा यह चाहती है कि झारखंड अपनी ही धरती से निकलने वाले खनिजों पर अतिरिक्त आर्थिक अधिकार का इस्तेमाल भी केंद्र की अनुमति से करे?
आलोक दूबे ने कहा कि भाजपा नेताओं को झारखंड की जनता को यह जवाब देना होगा कि राज्य की खनिज संपदा से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है, लेकिन खनन का सामाजिक और पर्यावरणीय बोझ झारखंड क्यों उठाए। उन्होंने कहा कि यह केवल कांग्रेस या झामुमो का मुद्दा नहीं है, बल्कि झारखंड के अधिकार, अस्मिता, रोजगार, विकास और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि खनिज अधिनियम कानून के खिलाफ कांग्रेस निर्णायक लड़ाई लड़ेगी। 7 सितंबर को महामहिम राज्यपाल के समक्ष प्रदर्शन कर केंद्र सरकार की इस नीति के खिलाफ विरोध दर्ज कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो आंदोलन को गांव से लेकर राजधानी और विधानसभा से लेकर दिल्ली तक ले जाया जाएगा।
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि झारखंड की जनता अपने जल, जंगल, जमीन और खनिज पर किसी का एकतरफा कब्जा स्वीकार नहीं करेगी। खनिज कानून के जरिए यदि झारखंड के आर्थिक अधिकारों, रोजगार और विकास योजनाओं को प्रभावित करने की कोशिश की गई तो इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
उन्होंने दावा किया कि खनिज अधिनियम कानून झारखंड की जनता के अधिकारों के खिलाफ भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित होगा और आने वाले समय में झारखंड से भाजपा के सफाये की पटकथा इसी मुद्दे से लिखी जाएगी।
