Ranchi:  झारखण्ड कांग्रेस कमेटी के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन को उत्सव के रूप में मनाने तथा बिहार समेत अन्य स्थानों पर ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाए जाने की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि जब बिहार में करीब 50 लाख लोग बाढ़ की त्रासदी झेल रहे हों, तब हजारों-लाखों दीये जलाकर उत्सव मनाना बाढ़ पीड़ितों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है।

 

आलोक कुमार दूबे ने कहा कि बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार करीब 49.74 लाख लोग 15 जिलों के 575 ग्राम पंचायतों और 88 प्रखंडों में बाढ़ से प्रभावित हैं। कई प्रमुख नदियां अब भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं।

 

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के अनुसार 8,27,472 बाढ़ प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में 579.23 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि डीबीटी के माध्यम से भेजी गई है। यह बताता है कि संकट कितना बड़ा है। ऐसे समय में सरकार और सत्ताधारी दलों की प्राथमिकता राहत, पुनर्वास, भोजन, दवा और प्रभावित परिवारों तक जरूरी सहायता पहुंचाना होना चाहिए।

 

प्रदेश कांग्रेस महासचिव ने कहा, “एक तरफ करीब 50 लाख लोग बाढ़ से परेशान हैं, हजारों परिवार अपने घर-बार और फसल के नुकसान से जूझ रहे हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीये जलाकर उत्सव मनाया जा रहा है। जिन घरों में चूल्हा नहीं जल रहा, वहां दीया जलाने का उत्सव आखिर किसके लिए है?”

 

आलोक दुबे ने कहा कि अगस्त 2026 में देश की खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 5.95 प्रतिशत दर्ज की गई है। बिहार में अगस्त की खुदरा महंगाई 4.22 प्रतिशत रही। वहीं अगस्त में देश की बेरोजगारी दर 5 प्रतिशत दर्ज की गई।

 

आलोक कुमार दूबे ने कहा कि महंगाई, बेरोजगारी और प्राकृतिक आपदा से जूझ रही जनता को दिखावे के उत्सव नहीं, बल्कि ठोस राहत और रोजगार चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का जन्मदिन मनाने पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन जब देश के एक बड़े राज्य में लाखों लोग आपदा से जूझ रहे हों, तब उत्सव और सरकारी प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

 

उन्होंने कहा, “सरकार को दीये की रोशनी से ज्यादा उन घरों की चिंता करनी चाहिए जहां बाढ़ का पानी घुसा है, उन परिवारों की चिंता करनी चाहिए जिनकी फसल बर्बाद हुई है और उन बच्चों की चिंता करनी चाहिए जिनकी पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी बाढ़ ने रोक दी है।”

 

आलोक कुमार दूबे ने कहा कि जनता को प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, संकट की घड़ी में संवेदनशील शासन और जमीन पर दिखाई देने वाली मदद चाहिए। प्रधानमंत्री के जन्मदिन को सेवा दिवस के रूप में मनाना है तो सबसे बड़ा सेवा कार्य यही होगा कि बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत, भोजन, दवा, सुरक्षित आवास और पुनर्वास की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए।

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