Ranchi: भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित संगठनात्मक बैठक और उसके बाद की गई प्रेसवार्ता पर प्रतिक्रिया देते हुए झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव आलोक कुमार दुबे ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट को “लोक कल्याणकारी” बताना सच्चाई से कोसों दूर है। उन्होंने कहा कि यह बजट जमीन पर राहत देने वाला नहीं, बल्कि खोखले दावों और आंकड़ों की बाजीगरी का दस्तावेज है। भाजपा के संगठन मंत्री अरुण सिंह जी यह बताएं कि इस बजट से झारखंड की साढे तीन करोड़ जनता को क्या हासिल हुआ है।

 

आलोक कुमार दुबे ने कहा कि भाजपा नेताओं द्वारा युवाओं, किसानों, महिलाओं और मध्यम वर्ग के नाम पर किए जा रहे दावे वास्तविकता से मेल नहीं खाते। आज देश का युवा बेरोजगारी से जूझ रहा है, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक आम हो चुका है और स्थायी रोजगार के अवसर लगातार घटते जा रहे हैं। ऐसे में बजट को युवाओं के सपनों को उड़ान देने वाला बताना केवल राजनीतिक बयानबाजी है।

 

उन्होंने कहा कि किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करने वाली मोदी सरकार आज न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी देने से बच रही है। कृषि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल रहा। बजट में कृषि के नाम पर तकनीक और योजनाओं की बातें की गईं, पर किसान की आय और कर्ज से राहत को लेकर कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया।

 

मध्यम वर्ग को राहत देने के दावे पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च ने आम परिवार की कमर तोड़ दी है। बजट में कर संबंधी कुछ घोषणाएं कर दी गईं, लेकिन बढ़ती महंगाई और घटती क्रय शक्ति पर सरकार पूरी तरह मौन है। इलाज सस्ता होने के दावे तब खोखले लगते हैं, जब सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, दवाइयां और बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।

 

झारखंड को मिलने वाली राशि को लेकर किए गए दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए आलोक कुमार दुबे ने कहा कि केंद्र सरकार पहले यह स्पष्ट करे कि पिछले वर्षों में घोषित राशि में से कितना पैसा वास्तव में राज्य को समय पर मिला और कितना खर्च करने योग्य स्थिति में था। उन्होंने कहा कि टैक्स शेयर और ग्रांट का आंकड़ा गिनाना आसान है, लेकिन राज्यों की घटती वित्तीय स्वायत्तता और लंबित भुगतान की सच्चाई भाजपा छुपा रही है।

 

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार हर मंच से “डबल इंजन” की बात करती है, लेकिन हकीकत यह है कि राज्यों के अधिकार लगातार कमजोर किए जा रहे हैं। 16वें वित्त आयोग में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग को नजरअंदाज करना इसका ताजा उदाहरण है। एक ओर केंद्र अपनी योजनाओं का श्रेय लेता है, दूसरी ओर वित्तीय बोझ राज्यों पर डाल देता है।

 

आलोक कुमार दुबे ने कहा कि भाजपा द्वारा राज्य सरकार पर लगाए जा रहे भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के आरोप ध्यान भटकाने की कोशिश हैं। यदि केंद्र सरकार सच में जवाबदेह है तो उसे यह बताना चाहिए कि पिछले 11 वर्षों में बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असमानता क्यों बढ़ी है। उन्होंने कहा कि झारखंड की जनता अब आंकड़ों और भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले काम से सरकार का मूल्यांकन करेगी।

 

वित्तीय वर्ष 2025–26 के लिए केंद्र सरकार ने कुल ₹50.65 लाख करोड़ का केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया था, जिसमें ₹11.21 लाख करोड़ पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित किए गए थे, लेकिन सवाल यह है कि इस विशाल आवंटन का कितना हिस्सा वास्तव में ज़मीन पर खर्च हो पाया। उपलब्ध सरकारी विश्लेषण और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कई सामाजिक और विकासात्मक क्षेत्रों में बजट उपयोग अपेक्षा से काफी कम रहा। शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में आवंटन के बावजूद वास्तविक खर्च 30–40 प्रतिशत के आसपास ही सिमटा रहा, जबकि कुछ मदों में इससे भी कम उपयोग दर्ज किया गया। यह अंतर इस बात की ओर इशारा करता है कि बजट आवंटन और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच गंभीर खाई मौजूद है। जब एक ओर सरकार बजट को ऐतिहासिक और लोक-कल्याणकारी बता रही है, वहीं दूसरी ओर बड़ी राशि का समय पर और प्रभावी उपयोग न हो पाना वित्तीय प्रबंधन और नीति क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिनका जवाब सरकार को देना होगा।

 

उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी इस बजट की सच्चाई को जनता के बीच ले जाएगी और बताएगी कि किस तरह यह बजट आम आदमी की बजाय चुनिंदा वर्गों को फायदा पहुंचाने वाला है।

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