Ranchi: देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली पहाड़ियाँ को बचाने के बजाय भाजपा सरकार ने उसे कानूनी तौर पर कमजोर करने का रास्ता चुना है। ‘100 मीटर ऊँचाई’ की नई परिभाषा के नाम पर अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर कर दिया गया है, जिससे अवैध खनन, रियल एस्टेट और कॉरपोरेट परियोजनाओं के लिए दरवाज़े खोल दिए गए हैं।
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने इस फैसले को “पर्यावरणीय मौत का फरमान” बताते हुए भारतीय जनता पार्टी पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “अरावली कोई इमारत नहीं, जिसे ऊँचाई से नापा जाए। यह एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है, जो हवा, पानी और जलवायु संतुलन को संभालता है। 100 मीटर की शर्त लगाकर सरकार ने विज्ञान नहीं, सौदेबाज़ी को तरजीह दी है।”
दुबे ने आरोप लगाया कि यह बदलाव बड़े कॉरपोरेट हितों के दबाव में किया गया है, ताकि अडानी समूह जैसे औद्योगिक घरानों को खनन और निर्माण की खुली छूट मिल सके। “जो पहाड़ कल तक जनता की सांस थे, आज उन्हें मुनाफे की जमीन बना दिया गया,” उन्होंने कहा।
केंद्र की सत्ता पर निशाना साधते हुए दुबे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर्यावरण संरक्षण पर भाषण तो देते हैं, लेकिन नीतियाँ कॉरपोरेट-अनुकूल बनाते हैं। “यह दोहरा चरित्र अब देश के सामने बेनकाब हो चुका है,” उन्होंने जोड़ा।
झारखंड की राजनीति पर भी उन्होंने भाजपा को घेरा। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी से सवाल करते हुए दुबे ने कहा कि “अगर वे सच में जल-जंगल-जमीन की बात करते हैं, तो अरावली जैसे राष्ट्रीय पर्यावरणीय मुद्दे पर चुप्पी क्यों? क्या यह चुप्पी भाजपा की नीतियों की मौन स्वीकृति नहीं है?”
कांग्रेस महासचिव ने मांग की, कि अरावली की 100 मीटर आधारित परिभाषा को तत्काल वापस लिया जाए, पूरे क्षेत्र को समग्र पारिस्थितिकी तंत्र मानकर संरक्षण दिया जाए और इस बदलाव के पीछे काम कर रहे कॉरपोरेट-राजनीतिक गठजोड़ की स्वतंत्र जांच कराई जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पर्यावरण और जनहित के सवाल पर किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगी।
