Ranchi: झारखंड कांग्रेस के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने MMDR Amendment Act, 2026 को लेकर भाजपा के तर्कों पर पलटवार करते हुए कहा कि इतने गंभीर विषय को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करने के बजाय भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि झारखंड के खनिज संसाधनों से जुड़े राजस्व हितों और राज्य के आर्थिक अधिकारों की रक्षा कैसे होगी।
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि झारखंड सरकार का संशोधित MMDR कानून को लेकर विरोध कोई काल्पनिक या राजनीतिक रूप से गढ़ा हुआ मुद्दा नहीं है। झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अगस्त 2026 में सार्वजनिक रूप से कहा था कि संशोधन से राज्य को लगभग ₹14,000 करोड़ के संभावित राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है और राज्य सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। उन्होंने कहा कि MMDR Amendment Bill, 2026 में राज्यों द्वारा mineral rights और mineral-bearing lands पर लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और अन्य लेवी पर केंद्रीय शर्तें लागू करने का प्रावधान किया गया है। PRS के विश्लेषण के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था राज्यों की mineral taxation powers को प्रभावित कर सकती है। साथ ही, भूमि कराधान और mineral rights taxation के संबंध में राज्यों और केंद्र की शक्तियों का संवैधानिक विभाजन भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आलोक दूबे ने कहा कि भाजपा यह बताए कि यदि केंद्र के कानून का प्रभाव झारखंड जैसे खनिज-समृद्ध राज्य के राजस्व पर पड़ सकता है, तो राज्य सरकार को अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवाज उठाने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह किसी दल विशेष का विषय नहीं, बल्कि झारखंड की जनता के संसाधनों और विकास से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार ने Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 बनाया था। मूल कानून में कोयला और लौह अयस्क पर ₹100 प्रति मीट्रिक टन की दर निर्धारित की गई थी, जिसे बाद के संशोधनों के माध्यम से बढ़ाया गया। 2025 के अंत तक कोयले पर ₹450 और लौह अयस्क पर ₹600 प्रति टन की दर रिपोर्ट की गई।
आलोक दूबे ने कहा कि भाजपा को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि केंद्र के नए प्रावधानों से झारखंड की इस राजस्व व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा और यदि राज्य के राजस्व अधिकार सीमित होते हैं तो उसकी भरपाई या वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी। उन्होंने कहा कि Mineral Area Development Authority मामले में सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2024 के फैसले के बाद राज्यों की mineral taxation powers को लेकर महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस सामने आई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में राज्यों की कराधान शक्तियों और संसद द्वारा लगाई जा सकने वाली सीमाओं के संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया गया था।
झारखंड कांग्रेस महासचिव ने कहा कि झारखंड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में है और यहां कोयला, लौह अयस्क सहित कई महत्वपूर्ण खनिज संसाधन हैं। ऐसे में खनिज राजस्व से संबंधित किसी भी केंद्रीय कानून पर राज्य सरकार द्वारा अपनी आपत्ति दर्ज कराना लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने भाजपा नेत्री अन्नपूर्णा देवी से सवाल किया कि झारखंड के खनिज संसाधनों से जुड़े संभावित ₹14 हजार करोड़ के राजस्व के संबंध में भाजपा का स्पष्ट रुख क्या है? क्या भाजपा झारखंड के राजस्व हितों की रक्षा के लिए राज्य सरकार की आपत्तियों का जवाब देगी या केवल राजनीतिक आरोप लगाकर इस गंभीर विषय को टालती रहेगी?
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि कांग्रेस जनता के सामने कानून की वास्तविक provisions, राज्य के राजस्व पर उसके संभावित प्रभाव और झारखंड के संवैधानिक एवं आर्थिक अधिकारों से जुड़े तथ्यों को रखेगी। जनता को आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि तथ्य और स्पष्ट जवाब चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस झारखंड की खनिज संपदा के पारदर्शी, वैधानिक और जनहितकारी उपयोग के पक्ष में है। खनिज संसाधनों से प्राप्त राजस्व का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ग्रामीण आधारभूत संरचना और प्रभावित खनन क्षेत्रों के विकास में होना चाहिए।
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा केवल जमीन के नीचे मौजूद संसाधन नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक ताकत है। उसके राजस्व हितों की रक्षा करना किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि झारखंड के व्यापक जनहित का प्रश्न है।
